इंतजार करती आत्मा...जाने किसका...???
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कहते हैं कि आदमी एक खिलौना है उस शक्ति का, जो अपने मनोरंजन के लिए, अपने हिसाब से आदमी के साथ खेलती है। इस खेल में आदमी का बस नहीं चलता, उसे तो बस एक कठपुतली की तरह उस शक्ति के इशारों पर नाचना पड़ता है। वह शक्ति जिसके अदृश्य होकर भी दृश्य होने का भान है, वह कभी-कभी कुछ ऐसे खेल कर जाती है कि खिलौना टूटकर बिखर जाता है या उसकी दृश्यता अदृश्यता में परिणित हो जाती है। जी हाँ, परिणीता बनने से पहले ही उस शक्ति ने कुछ ऐसा ही खेल खेला नैंसी के साथ। ऐसा खेल जो नैंसी के जीवन में ऐसा भूचाल ला दिया कि वह सदा-सदा के लिए अदृश्यता में दृश्य बन गई। हुआ यह था कि सूरज सीमा पर आतंकी गतिविधियों का शिकार हो गया था और उसकी लाश भी शायद आतंकी उठाकर ले गए थे। सेना के कई जवान, अधिकारी गायब हो गए थे और 15-20 दिन तक खोज करने के बाद भी जब उनका अता-पता नहीं मिला तो सेना ने यह मान लिया था कि वे आतंक की भेंट चढ़ गए।
नैंसी, वही नैंसी जो पहले एक हिरणी की तरह कुलाछें भरती रहती थी, अब एक मूर्ति बनकर रह गई थी। खाना-पीना सबकुछ त्याग दिया था उसने। गाँव वालों ने, रमेसर काका ने उसे बहुत समझाया पर सब कुछ समझकर भी वह एक नासमझ बनी रही। सूनी आँखों से राह निहारती रही, गाँव के बाहर पागलों जैसी घूमती रही। एक दिन पता नहीं उसे क्या सूझा कि उसने सरकार को पत्र लिखा, जिसमें उसने लिखा था कि उसका सूरज जिंदा है, वह मरा नहीं है। फिर से अभियान चलाकर उसकी नई सिरे से खोज की जाए, वह जरूर मिल जाएगा। पर सरकार उस पत्र पर कोई कार्रवाई नहीं की क्योंकि वह भी पूरी तरह से मान चुकी थी कि सूरज शहीद हो चुका है। अब नैंसी के पास खुद कुछ करने के सिवाय और कोई चारा नहीं था। वह हर हालत में सूरज को पाना चाहती थी और उसका दिल यह मानने को कत्तई तैयार नहीं था कि सूरज अब नहीं रहा। क्योंकि वह एक दिन रमेसर काका से भी कह रही थी कि काका, अगर सूरज नहीं रहा तो मुझे इसका एहसास क्यों नहीं हुआ? काका, हम दो जिस्म पर एक जान हैं, अगर उसे कुछ हुआ होता तो मुझे जरूर पता चलता। पर सात्विक, समर्पित प्रेम को समझना सबके बस की बात नहीं होती, रमेसर काका ने इसे नैंसी का सूरज के प्रति दिवानगी, पागलपन समझा और बस उसे सांत्वना देकर रह गए
।कहते हैं कि आदमी एक खिलौना है उस शक्ति का, जो अपने मनोरंजन के लिए, अपने हिसाब से आदमी के साथ खेलती है। इस खेल में आदमी का बस नहीं चलता, उसे तो बस एक कठपुतली की तरह उस शक्ति के इशारों पर नाचना पड़ता है। वह शक्ति जिसके अदृश्य होकर भी दृश्य होने का भान है, वह कभी-कभी कुछ ऐसे खेल कर जाती है कि खिलौना टूटकर बिखर जाता है या उसकी दृश्यता अदृश्यता में परिणित हो जाती है। जी हाँ, परिणीता बनने से पहले ही उस शक्ति ने कुछ ऐसा ही खेल खेला नैंसी के साथ। ऐसा खेल जो नैंसी के जीवन में ऐसा भूचाल ला दिया कि वह सदा-सदा के लिए अदृश्यता में दृश्य बन गई। हुआ यह था कि सूरज सीमा पर आतंकी गतिविधियों का शिकार हो गया था और उसकी लाश भी शायद आतंकी उठाकर ले गए थे। सेना के कई जवान, अधिकारी गायब हो गए थे और 15-20 दिन तक खोज करने के बाद भी जब उनका अता-पता नहीं मिला तो सेना ने यह मान लिया था कि वे आतंक की भेंट चढ़ गए।
नैंसी, वही नैंसी जो पहले एक हिरणी की तरह कुलाछें भरती रहती थी, अब एक मूर्ति बनकर रह गई थी। खाना-पीना सबकुछ त्याग दिया था उसने। गाँव वालों ने, रमेसर काका ने उसे बहुत समझाया पर सब कुछ समझकर भी वह एक नासमझ बनी रही। सूनी आँखों से राह निहारती रही, गाँव के बाहर पागलों जैसी घूमती रही। एक दिन पता नहीं उसे क्या सूझा कि उसने सरकार को पत्र लिखा, जिसमें उसने लिखा था कि उसका सूरज जिंदा है, वह मरा नहीं है। फिर से अभियान चलाकर उसकी नई सिरे से खोज की जाए, वह जरूर मिल जाएगा। पर सरकार उस पत्र पर कोई कार्रवाई नहीं की क्योंकि वह भी पूरी तरह से मान चुकी थी कि सूरज शहीद हो चुका है। अब नैंसी के पास खुद कुछ करने के सिवाय और कोई चारा नहीं था। वह हर हालत में सूरज को पाना चाहती थी और उसका दिल यह मानने को कत्तई तैयार नहीं था कि सूरज अब नहीं रहा। क्योंकि वह एक दिन रमेसर काका से भी कह रही थी कि काका, अगर सूरज नहीं रहा तो मुझे इसका एहसास क्यों नहीं हुआ? काका, हम दो जिस्म पर एक जान हैं, अगर उसे कुछ हुआ होता तो मुझे जरूर पता चलता। पर सात्विक, समर्पित प्रेम को समझना सबके बस की बात नहीं होती, रमेसर काका ने इसे नैंसी का सूरज के प्रति दिवानगी, पागलपन समझा और बस उसे सांत्वना देकर रह गए
लगभग 1 महीने बीत गए, अब नैंसी थोड़ी कठोर सी लगने लगी थी। उसके चेहरे पर अजीब से भाव बनते-बिगड़ते रहते थे। लोगों को लगता था कि वह थोड़ी सी बाबली हो गई है। एक दिन सुबह जब रमेसर काका खेतों से लौटकर घर वापस आए तो नैंसी घर में न दिखी। दरअसल नैंसी तो सूरज की खोज में निकल गई थी। नैंसी के जाने के लगभग 14-15 दिनों के बाद एक ऐसी घटना घटी जो रमेसर काका और गाँव वालों के लिए बहुत ही हृदय-विदारक थी। इस घटना ने पूरे गाँव को स्तब्ध तो कर दिया था पर पूरे गाँव वाले क्या, जो भी इस घटना को सुनता, नैंसी के कारनामे के आगे नतमस्तक हो जाता। दरअसल नैंसी एक सैनिक के भेष में भारतीय सैनिकों की आँख से बचते हुए वहाँ पहुँच गई थी जहाँ से सूरज गायब हुआ था। उस जगह पर पहुँचकर नैंसी ने गोली चलाते हुए दुश्मन सेना के खेमे में भूचाल ही नहीं लाया था अपितु कितनों को मार गिराया था और भारतीय सेना कुछ समझ पाती इससे पहले ही दुश्मन सेना की एक गोली ने उसकी इह-लीला कर दी थी। फिर सेना के जवानों ने नैंसी के शव को अपने कब्जे में लेकर कुछ कागजी कार्रवाई करने के बाद उसे ससम्मान रमेसर काका को सौंप दिए थे। नैंसी के चले जाने से केवल रमेसर काका का ही घर काटने को नहीं दौड़ता था, अपितु पूरे गाँव में शोक की लहर थी। यहाँ तक कि वह ग्रामीण, सात्विक, मनोरम परिवेश अब आग उगलने लगा था
पर समय अच्छे-अच्छे घावों को भर देता है। काफी समय बीत जाने के बाद गाँव फिर से अपने पुराने ढर्रे पर लौटने लगा था। लोग बीती बातों को याद कर अपनी आँखें तो गीली कर लेते थे पर उसे एक बुरा स्वप्न मानकर भूल जाना चाहते थे। एक दिन सुबह-सुबह रमेसर काका खेतों से लौटकर आए तो क्या देखते हैं कि घर में किसी के पायल की आवाज सुनाई दे रही है। उन्हें बहुत ही कौतुहल हुआ पर जब वे घर में घुसे तो चूल्हा जलता देख उनके सर की लकीरों के साथ ही पसीने भी उभर आए। जो कुछ भी हो रहा था, वह अजीब था और रमेसर काका कुछ समझ नहीं पा रहे थे। तभी उन्हें एक आवाज ने विस्मित कर दिया, जी हाँ एक महिला आवाज ने। वह सुमधुर आवाज किसी और की नहीं अपितु नैंसी की ही थी। वह आहिस्ते से बोल रही थी, “बाबूजी, डरिए नहीं। मैं हूँ मैं, नैंसी। मैं वापस लौट आई हूँ और बहुत ही जल्द सूरज को भी वापस लाऊँगी।” रमेसर काका के पैर पीछे की ओर मुड़ गए। वे तेजी से घर के बाहर निकले और घर से बाहर निकले ही चिल्लाने लगे। उनकी चिल्लाहट सुनकर गाँव के काफी लोग एकत्र हो गए, फिर उन्होंने लोगों के पूछने पर उंगुली से घर की ओर इशारा करते हुए, कंपकपाई आवाज में कहा कि वह लौट आई है? गाँव के कुछ लोगों ने हिम्मत करके घर में प्रवेश किया कि आखिर कौन लौट आई है, ऐसा क्या हुआ है कि रमेसर काका एकदम से सहम गए हैं? जब गाँव वालों ने घर के अंदर प्रवेश किया तो उन्हें भी किसी के पायल की आवाज सुनाई देने के साथ ही बहुत कुछ ऐसा दिखा, महसूस हुआ जिससे उन्हें भी नैंसी के लौट आने पर भरोसा हो गया, पर फिर भी वे यह मानने को तैयार नहीं थे, क्योंकि नैंसी तो मर चुकी थी, वह कैसे आ सकती है???? अजीब स्थिति थी, फिर कुछ लोगों ने हिम्मत करके नैंसी को आवाज लगाई पर अब तो पायल की आवाज भी गायब हो गई थी, फिर क्या था कुछ लोगों ने रमेसर काका का पूरा घर छान मारा पर उसे नैंसी कहीं नहीं मिली। अब तो गाँव वाले पूरी तरह से डर गए थे, तो क्या नैंसी की आत्मा
खैर, उस दिन गाँव वालों ने दोपहर में मंदिर पर एकत्र होकर इस पर चर्चा करनी शुरु कर दी। आखिर अगर नैंसी की आत्मा वापस आ गई है तो अब क्या करना चाहिए? कहीं ऐसा न हो कि वह हम गाँव वालों को परेशान करे। गाँव के बढ़-बुजुर्ग अभी यही सोच रहे थे कि तभी एक हल्की सी आँधी उठी, कोई कुछ समझ पाता इससे पहले ही मंदिर का बड़ा घंटा अपने आप बजने लगा। सब लोग सहमकर बैठ गए, किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, तभी घंटे की आवाज धीमी होने लगी और एक अदृश्य महिला आवाज गूँजने लगी, “हाँ, मैं नैंसी हूँ नैंसी, मैं वापस लौट आई हूँ और जबतक सूरज को लाकर रमेसर काका को सौंप नहीं देती, मैं यहाँ से नहीं जाऊँगी, पर हाँ मैं यह भी वादा करती हूँ कि मेरे कारण इस गाँव के किसी का भी कोई बुरा नहीं होगा। मैं बहू हूँ इस गाँव की और सदा अपने संबंध को निभाती रहूँगी।” यह आवाज होते ही गाँव वालों के पास अब कुछ कहने या सोचने के लिए कुछ भी तो नहीं बचा था। उन्हें अदृश्यता में दृश्यता का भान हो चुका था। सभी लोग अपने-अपने घरों को जा चुके थे। दूसरे दिन से प्रतिदिन सुबह-सुबह एक अदृश्य आत्मा गाँव में घूम-घूमकर लोगों को सजग करती नजर आने लगी, उसके होने का एहसास तो सबको हो रहा था पर उसकी अदृश्यता एक अबूझ पहेली बनी हुई थी
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